सुरेन्द्र

सुरेन्द्रनाथ उर्फ़ सुरेन्द्र सिर्फ़ एक उम्दा अभिनेता नहीं थे बल्कि एक बेहतरीन गायक भी थे, जिन्हें बॉम्बे फ़िल्म इंडस्ट्री का के एल सहगल कहा जाता था और ग़रीबों का देवदास भी, मगर क्यों ? आइए उनकी पुण्यतिथि पर उनके बारे में थोड़ा और जानने की कोशिश करते हैं।

सुरेन्द्रनाथ “बी ए एल एल बी”

सुरेन्द्रनाथ “बी ए एल एल बी” जी हाँ वक़ालत की पढाई पूरी करने के बाद ही उन्होंने फ़िल्मों का रुख़ किया था। और उनके पिता जो उनके इस फ़ैसले से बिलकुल ख़ुश नहीं थे उन्होंने ये शर्त रखी थी कि फ़िल्मों में उनका पूरा नाम दिया जायेगा। पर आज भी लोग उन्हें सुरेन्द्र के नाम से ही जानते हैं। उन्होंने बाद के दौर में चरित्र भूमिकाएँ भी की थीं और बहुत से लोग शायद उन्हें बतौर करैक्टर आर्टिस्ट ही जानते हों, मगर वो अपने ज़माने के स्टार थे। 

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11 नवम्बर 1910 को पंजाब के बटाला में जन्म हुआ सुरेन्द्रनाथ का, उनके पिता का नाम था रलिया राम शर्मा। अम्बाला की पंजाब यूनिवर्सिटी से B. A. LLB की डिग्री लेने के बाद वो वक़ालत करने की तैयारी में थे कि दिल्ली के एक बड़े फ़िल्म डिस्ट्रीब्यूटर की नज़र उन पर पड़ी और उन्होंने सुरेन्द्र की आँखों को एक नया सपना दे दिया – फ़िल्मों में काम करने का सपना। उस समय की फ़िल्मों में काम करने के लिए दो मुख्य क्वालिटीज़ की ज़रुरत होती थी और वो दोनों उनके पास थीं। पहली अच्छी शक़्ल-सूरत, और दूसरी सुरीली आवाज़।

सुरेन्द्र पहली ही फिल्म से लोकप्रिय हो गए थे

सुरेन्द्र अपने कॉलेज के दिनों में स्टेज पर गाया करते थे और इतना अच्छा गाते थे कि पूरे कॉलेज के चहीते गायक थे। थोड़ा बहुत कन्फूशन अगर रहा भी होगा तो दोस्तों के प्रोत्साहन से दूर हो गया और फिर वो पंजाब छोड़कर मुंबई आ गए। मुंबई में उन्होंने महबूब ख़ान से मुलाक़ात की जो उस समय सागर मूवीटोन के साथ काम कर रहे थे। और फिर 1936 की फ़िल्म “डेक्कन क्वीन” (daccan queen) में सुरेंद्र पहली बार सिल्वर स्क्रीन पर नज़र आये।

सुरेन्द्र
सुरेन्द्र और महबूब ख़ान

इस फिल्म में सुरेन्द्र का गाया एक गाना “बिरहा की आग लगी मोरे मन में” उस समय बहुत मशहूर हुआ। ये गाना के एल सहगल की फ़िल्म देवदास के गाने “बालम आये बसो मोरे मन मे” की धुन पर ही बनाया गया था। इसके अलावा सुरेन्द्र की गाई एक ग़ज़ल भी काफ़ी पॉपुलर हुई। 

दरअस्ल देवदास के बाद से कलकत्ता में के एल सहगल की धूम मची थी और सुरेन्द्र का मुंबई की फ़िल्मी दुनिया में पदार्पण ठीक उसी वक़्त में हुआ। उनकी सिंगिंग स्किल्स और ख़ूबसूरत चेहरे ने बॉम्बे फ़िल्म इंडस्ट्री में के एल सहगल की कमी को पूरा किया। और फिर बॉम्बे फ़िल्ममेकर्स उन्हें के एल सहगल के सब्सिट्यूट के तौर पर देखने लगे। उस वक़्त कलकत्ता फिल्म इंडस्ट्री और बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री एक तरह से कम्पेटिटर थे। अक्सर बॉम्बे फ़िल्म इंडस्ट्री के धुरंधर कोलकाता के कलाकारों को लुभावने ऑफर्स दिया करते थे और बहुत से लोग इसी तरह से कोलकाता से मुंबई पहुँचे भी। 

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जब देवदास को अपार सफलता मिली तो महबूब ख़ान के मन में भी उसी तरह की एक फ़िल्म बनाने का ख़याल आया। और अब तो उनके पास एक वैसी आवाज़ भी थी जो के एल सहगल जैसे गायक को टक्कर दे सकती थी। तो उन्होंने सुरेन्द्र को लेकर बनाई “मनमोहन”(1936) जिसकी कहानी, पटकथा और संवाद लिखे ज़िया सरहदी ने। ये फ़िल्म सुपरहिट रही और इसके बाद सुरेंद्र को “ग़रीबों का देवदास” कहा जाने लगा। इस फिल्म में उनका गाया गाना “तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया” बहुत मशहूर हुआ था। 

1936 में ही सागर मूवीटोन की एक और फ़िल्म आई “ग्राम कन्या”, इन तीनों फिल्मों की कामयाबी ने सुरेन्द्र को बतौर सिंगर-एक्टर पूरी तरह बॉम्बे फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया। 1937 की जागीरदार भी हिट रही मगर 1938 में आई “ग्रामोफ़ोन सिंगर” बहुत पसंद की गई। इस फिल्म में उनके साथ थीं बिब्बो, इन दोनों की जोड़ी दर्शकों को इतनी पसंद आई कि बाद में कई फ़िल्मों में इस जोड़ी को दोहराया गया। इस फिल्म में उनका गाया एक गाना बहुत लोकप्रिय हुआ – “एक छोटा सा मंदिर बनाया हुआ है” 

सुरेन्द्र

सुरेन्द्र ने अपनी क़ाबिलियत से ये साबित किया कि वो सिर्फ़ के एक सहगल की परछाईं नहीं है। उनकी अपनी पहचान है जो आने वाली फ़िल्मों में और भी मज़बूत हुई। महबूब खान ने जब नेशनल स्टुडिओज़ के लिए “औरत” (1940) बनाई तो उसमें सुरेंद्र ने बड़े बेटे की भूमिका की थी। आपको याद दिला दूँ कि “औरत” वही फ़िल्म है जिसकी कहानी को महबूब ख़ान ने दोबारा बनाया “मदर इंडिया” के नाम से। जो भूमिका “मदर इंडिया” में राजेंद्र कुमार ने निभाई थी वही रोल “औरत” में सुरेंद्र ने किया था। इस फ़िल्म में उन्होंने ज्योति के साथ एक गाना गाया था – “उठ सजनी खोल किवाड़े तेरे साजन आये द्वारे” 

1940 में किसी फ़िल्म की शूटिंग के दौरान वो घोड़े से गिर गए और उन्हें काफ़ी चोट आई जिसकी वजह से वो काफ़ी समय तक शूट नहीं कर पाए। और ये अफवाह भी फैली कि अब वो कभी फ़िल्म में काम नहीं कर पाएँगे मगर उनके प्रशंसकों की दुआएँ थीं कि वो एकदम ठीक होकर वापस लौटे। 

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महबूब ख़ान ने सुरेन्द्र को पहला मौक़ा दिया था, जब सागर मूवीटोन और जनरल फ़िल्म्स का मर्जर हुआ और नेशनल स्टूडियो की नींव पड़ी तो उसकी दो फ़िल्मों में सुरेंद्र ने महबूब ख़ान के निर्देशन में काम किया – 1940 की औरत और 1940 में ही आई अलीबाबा। जब महबूब ख़ान ने अपना प्रोडक्शन शुरु किया तो उसकी पहली सुपरहिट फ़िल्म भी वो थी जिसमें सुरेंद्र ने अभिनय किया था – अनमोल घड़ी 

ट्रिविया 

“अनमोल घड़ी” में तीन म्यूज़िकल स्टार्स थे – सुरेन्द्र, नूरजहाँ और सुरैया। फिल्म की कहानी सुरेंद्र को ध्यान में रखकर ही लिखी गई थी। मगर किसी ग़लतफ़हमी की वजह से बाद में महबूब ख़ान किसी और हीरो को तलाशने में जुट गए, लेकिन कोई भी जब उस कसौटी पर खरा नहीं उतरा तो फरदून ईरानी ने दोनों का पैच-अप कराया और तब जाकर “अनमोल घड़ी” बन पाई। इस के बाद आई “ऐलान” (1947) और “अनोखी अदा”(1948) उतना कमाल नहीं कर पाई। मगर “अनमोल घड़ी” उनकी सबसे यादगार म्यूज़िकल फ़िल्म थी जिसका हरेक गाना लाजवाब है।

सुरेन्द्र ने जिन दिनों काम शुरु किया था स्टूडियो सिस्टम हुआ करता था। मगर उनकी फ़िल्मों पर नज़र डालें तो उन्होंने 40 के दशक में अलग-अलग स्टुडिओज़ और फ़िल्म डायरेक्टर्स के साथ काम किया। 1943 की “पैग़ाम” अमर पिक्चर्स के बैनर तले बनी, “विषकन्या” (1943) रंजीत स्टूडियो की फिल्म थी, “विश्वास” (1943) वाडिया मूवीटोन की और “लाल हवेली” (1944) बॉम्बे सिनेटोन की, “भर्तृहरि” (1944) नवीन पिक्चर्स ने बनाई थी और “मझधार” (1947) मिनर्वा मूवीटोन की फ़िल्म थी। महबूब ख़ान ने जब महबूब प्रोडक्शन बनाया शायद उसी दौरान सुरेंद्र ने भी बतौर फ्रीलांसर काम करना शुरू कर दिया था।

सुरेन्द्र

“बैजू बावरा” (1952) फ़िल्म महान गायक बैजू के जीवन पर आधारित थी, उस फ़िल्म में सुरेंद्र ने तानसेन की भूमिका निभा कर बहुत प्रशंसा पाई थी। क्योंकि उस्तादों की गायकी पर लिपसिंक करना कोई आसान काम नहीं था। लेकिन सुरेन्द्रनाथ ने इसे इतनी ख़ूबी से किया कि जब के आसिफ़ बिग बजट वाली ड्रीम फ़िल्म बना रहे थे तो उसमें भी तानसेन की भूमिका के लिए सुरेंद्र को ही चुना गया।

सुरेंद्र चरित्र भूमिकाओं में भी पसंद किये गए

“बैजू बावरा”(1952), “गवैया” जैसी कुछेक फ़िल्मों को छोड़ दें तो 50 के दशक के मध्य तक तक वो हीरो-हेरोइन के पिता की भूमिका में नज़र आने लगे थे। “दिल देके देखो”, “हरियाली और रास्ता”, “गीत गाया पत्थरों ने”, “मिलन”, “सरस्वतीचंद्र”, “दाग़”, “36 घंटे” जैसी फ़िल्मों में चरित्र भूमिकाओं में नज़र आये। उनकी आख़िरी फ़िल्म थी 1977 में आई “अभी तो जी लें” उसके बाद उन्होंने फ़िल्मों को छोड़ दिया। 

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फ़िल्में छोड़ने के बाद सुरेन्द्र ने अपनी एड-एजेंसी शुरु की “सुरेंद्र फ़िल्म प्रोडक्शंस” के नाम से। बाद में उसका नाम दो बार बदला पहले J K advertisement  फिर वो हो गया – FAR प्रोडक्शंस। उनकी शादी 1945 में हुई थी लेखक तिलक ऋषि की बहन सत्यऋषि से। उनके चार बच्चे हुए – सुनीता, जीतेन्द्र, कैलाश, और रोहिणी। दूरदर्शन पर जो अलग-अलग भाषाओं में “मिले सुर मेरा तुम्हारा ” का फर्स्ट वर्शन आया था वो उनके बेटे कैलाश सुरेन्द्रनाथ ने ही बनाया था।  

11 सितम्बर 1987 को सुरेन्द्र ने हमेशा के लिए आँखें मूँद लीं। आज शायद उनके बारे में न जानता हो लेकिन क्या उनके गाये वो नग़मे भुलाए जा सकते हैं और जब तक वो नग़मे गुनगुनाए जाएंगे तब तक सुरेन्द्र भी लोगों के ज़हन में ज़िंदा रहेंगे। 

सुरेन्द्र

बतौर हीरो सुरेन्द्र के गाये कुछ यादगार नग़मे और फ़िल्में

  • बिरहा की आग लगी मोरे मन में – दक्कन क्वीन (1936) – सुरेंद्र – अनिल बिस्वास – जिया सरहदी – सागर मूवीटोन 
  • तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया – मनमोहन (1936) – बिब्बो, सुरेंद्र – अशोक घोष – जिया सरहदी – सागर मूवीटोन 
  • नदी किनारे बैठ के आओ  – जागीरदार (1937) – सुरेंद्र, माया बेनर्जी – अनिल बिस्वास – सागर मूवीटोन 
  • काहे अकेला डोलत बादल – ग्रामोफ़ोन सिंगर (1938) – सुरेंद्र – अनिल बिस्वास – जिया सरहदी – सागर मूवीटोन 
  • उठ सजनी खोल किवाड़े तेरे साजन आये द्वारे – औरत (1940) – सुरेंद्र, ज्योति – अनिल बिस्वास – नेशनल स्टुडिओज़ 
  • दिल का साज़ बजाए जा – अलीबाबा (1940) – सुरेंद्र, वहीदन बाई – अनिल बिस्वास – आह सीतापुरी – नेशनल स्टुडिओज़ 
  • भूल गए क्यों भूल गए  – अलीबाबा (1940) – सुरेंद्र, वहीदन बाई – अनिल बिस्वास – आह सीतापुरी – नेशनल स्टुडिओज़ 
  • भँवरा मधुबन में जा – भर्तृहरि (1944) – सुरेंद्र – खेमचंद प्रकाश –  
  • क्यों याद आ रहे हैं गुज़रे हुए ज़माने – अनमोल घड़ी (1946) – सुरेंद्र – नौशाद – तनवीर नक़वी – महबूब प्रोडक्शंस
  • आवाज़ दे कहाँ है – अनमोल घड़ी (1946) – सुरेंद्र, नूरजहाँ – नौशाद – तनवीर नक़वी – महबूब प्रोडक्शंस
  • लेडीज़ ओनली (1939)
  • फ़िल्म ‘1857″ (1943)
  • लाल हवेली (1944)
  • मझधार (1947)
  • मेरी कहानी (1948)
  • घरबार(1953)
  • गवैया(1954)
  • महात्मा कबीर(1954 ) 

By Neetu

Neetu Sharma is working in different fields of media for more than 21 years. Painter turned TV Host, Radio Jockey, Content Writer, and now YouTuber, and blogger.

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