ख़ुर्शीद बानो

ख़ुर्शीद बानो का नाम सुना है आपने ? ज़ोहराबाई अम्बालेवाली…. अमीरबाई कर्नाटकी…. !!! ये सभी सिनेमा के शुरुआती दौर की बहुत ही मशहूर गायिकाएं थीं, जिनकी आवाज़ के दीवानों की कोई कमी नहीं थी। लेकिन आज की पीढ़ी उनके नाम तक से वाक़िफ़ नहीं है।

इस पोस्ट में आप जानेंगे अपने समय की बेहद मशहूर और हसीन ख़ुर्शीद बानो के बारे में, जो 40s की पहली लीडिंग स्टार सिंगर-एक्टर थीं जिन्होंने बिना किसी फॉर्मल ट्रेंनिंग के, के. एल सहगल के साथ ऐसे-ऐसे गाने गाये जिनसे उन्हें पूरे देश में पॉपुलैरिटी मिल गई। 

ख़ुर्शीद बानो
ख़ुर्शीद बानो

14 अप्रैल 1914 को लाहौर में जन्मी ख़ुर्शीद बानो का असली नाम था – इरशाद बेगम। उन्होंने कोलकाता के मदन थिएटर्स की फ़िल्म “लैला मजनूँ” से अपने करियर की शुरुआत की। फिर शकुंतला, चित्र बक़ावली(32), हठीली दुल्हन(31), मुफ़लिस आशिक़(32) जैसी कुछ फ़िल्मों में उन्होंने सपोर्टिंग रोल्स किए। जब लाहौर में फ़िल्मी हलचल बढ़ने लगी तो वो अपनी क़िस्मत आज़माने लाहौर पहुँच गईं। वहाँ उन्होंने आर एल शौरी की फ़िल्म राधे-श्याम में काम किया इसके बाद स्वर्ग की सीढ़ी में हेरोइन के रूप में परदे पर दिखीं मगर इन फ़िल्मों से उन्हें कोई फायदा नहीं पहुँचा। उस वक़्त की उनकी फ़िल्में कामयाब नहीं हो पाईं इसलिए उन्होंने 1935 में मुंबई का रुख किया।

ख़ुर्शीद बानो का फिल्मों में सुनहरा वक़्त

ख़ुर्शीद बानो

मुंबई में ख़ुर्शीद बानो ने सरोज मूवीटोन ज्वाइन किया, 1937 में आई फिल्म “मुराद” में ख़ुर्शीद बानो की ख़ूबसूरती पर लोगों की नज़र पड़ी। 1939 में आई एवेरेस्ट पिक्चर्स की “सितारा” एज़रा मीर के निर्देशन में बनी थी, इस फ़िल्म में उन्हें काफी पसंद किया गया लेकिन उनका बहुत अच्छा वक़्त आना अभी बाक़ी था। और वो वक़्त तब आया जब वो रंजीत मूवीटोन से जुड़ीं। उन्हें के एल सहगल और मोतीलाल जैसे कलाकारों के साथ काम करने का मौक़ा मिला। 1940 में रिलीज़ हुई फ़िल्म “होली” और उसके बाद आई “परदेसी” से उनकी क़िस्मत बदल गई।

ख़ुर्शीद बानो

उस ज़माने में एक एक गाने पर बहुत मेहनत करनी पड़ती थी। “परदेसी(41)” फ़िल्म में संगीत दिया था खेमचंद प्रकाश ने, उनके असिस्टेंट थे पं जगन्नाथ प्रसाद जिन्होंने एक गाने की रिकॉर्डिंग से पहले ख़ुर्शीद से 15 दिनों तक लगातार रियाज़ कराया था। आजकल के वक़्त में ये अनोखी बात लग सकती है लेकिन तब रियाज़ के बग़ैर आर्टिस्ट फाइनल गाना गा ही नहीं सकते थे, तो 15 दिन लगातार रियाज़ करने के बाद ये गाना बना जो अपने समय में बहुत मशहूर हुआ था –

“पहले जो मोहब्बत से इंकार किया होता – परदेसी(1941) – ख़ुर्शीद बानो/ संगीत – खेमचंद प्रकाश / गीतकार – डी. एन. मधोक।

फिर आई वो फ़िल्में जिनसे ख़ुर्शीद ने स्टार का दर्जा पाया – “भक्त सूरदास(42)” और “तानसेन(43)” इनमें के. एल. सहगल के साथ ख़ुर्शीद बानो की सुपरहिट जोड़ी बनी जिसे लोगों ने इन्हें बहुत पसंद किया। 

ख़ुर्शीद बानो की मशहूर फ़िल्में

ख़ुर्शीद की मशहूर फ़िल्में थीं –

  • 1940 – मुसाफ़िर
  • 1941 – बेटी, शादी, परदेसी
  • 1942 – चाँदनी
  • 1944 – मुमताज़ महल, शहंशाह बाबर,
  • 1945 – मूर्ति,
  • 1946 – फुलवारी,
  • 1947 – मिटटी,
  • 1948 – आपबीती, पपीहा रे

ख़ुर्शीद बानो की आख़िरी फ़िल्म थी 1948 में आई सुपरहिट फ़िल्म “पपीहा रे” इसके बाद जब देश का विभाजन हुआ तो वो पाकिस्तान चली गईं। वहाँ उन्होंने दो फ़िल्मों में काम किया था मगर दोनों ही नहीं चलीं और उन्होंने फ़िल्मों से संन्यास ले लिया। ख़ुर्शीद ने अपने मैनेजर याक़ूब लाला से शादी की थी जो एक ज़माने में थोड़े वक़्त के लिए कारदार प्रोडक्शंस में एक्टर रह चुके थे। लेकिन 1956 में दोनों का तलाक़ हो गया। तलाक़ के बाद खुर्शीद ने एक व्यवसायी युसुफ़ भाई मियाँ से शादी की और अपने घर परिवार में व्यस्त हो गईं। 18 अप्रैल 2001 में ख़ुर्शीद बानो इस दुनिया से कूच कर गईं। 

ख़ुर्शीद बानो

आज फ़िल्म इंडस्ट्री बहुत बदल गई है, यहाँ की टेक्नीक और तौर-तरीक़े बदल गए हैं ऐसे में और भी ज़रुरी है उन कलाकारों-फ़नकारों को याद करना जिन्होंने सिनेमा के लड़खड़ाते क़दमों को संभाला, सीढ़ी-दर सीढ़ी आगे बढ़ाया और उसे समृद्ध करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। 

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You can also read some parts of this article in English translation

Khurshid Bano

Born on 14 April 1914 in Lahore, Khurshid Bano’s real name was Irshad Begum. She started his career with the film “Laila Majnu” by Kolkata’s Madan Theatres. Then she did supporting roles in some films like Shakuntala, Chitra Bakawali (32), Hathili Dulhan (31), Muflis Aashiq (32). When the film movement started increasing in Lahore, she reached Lahore to try her luck. There she acted in R.L. Shourie’s film Radhe-Shyam, after which she appeared on screen as a heroine in “Swarg Ki Seedhi”, but these films did not help her. Her films of that time were not successful, so he moved to Mumbai in 1935.

Khurshid Bano Filmi Career

In Mumbai, she joined Saroj Movietone, people noticed the beauty of Khurshid Bano in the 1937 film “Murad”. Everest Pictures’ “Sitara” in 1939 was directed by Ezra Mir, she was well received in this film but her good time was yet to come. And the time came when she joined Ranjit Movietone. She got an opportunity to work with artists like K.L.Saigal and Motilal. Her luck changed with the film “Holi” released in 1940 and then “Pardesi”.

Then came two films from which Khurshid achieved star status – “Bhakta Surdas(42)” and “Tansen(43)” in these movies she made a superhit pair with Saigal, which people liked very much.

Some of her famous films –

  • 1940 – Passenger
  • 1941 – Daughter, Married, Pardesi
  • 1942 – Chandni
  • 1944 – Mumtaz Mahal, Emperor Babur,
  • 1945 – Murti,
  • 1946 – Phulwari,
  • 1947 – Soil,
  • 1948 – Aapbiti, Papiha Re

Later Life Of Khurshid bano

Khurshid Bano’s last film was the 1948 superhit film “Papiha Re”, after which when the country was partitioned, she went to Pakistan. There she acted in two films but both did not work and she retired from films. Khurshid was married to his manager Yakub Lala, who was once an actor in Kardar Productions for a short time. But both got divorced in 1956. After the divorce, Khurshid married Yusuf Bhai Miyan, a businessman, and got busy with her family. Khurshid Bano left this world on 18 April 2001. and world forget her and her contribution of Hindi movies.

By Neetu

Neetu Sharma is working in different fields of media for more than 21 years. Painter turned TV Host, Radio Jockey, Content Writer, and now YouTuber, and blogger.

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