D N मधोक

D N मधोक – फ़िल्मी गीतकारों की पहली पीढ़ी के तीन प्रमुख गीतकारों में से एक जिन्होंने बहुत से लोकप्रिय और अविस्मरणीय गीत लिखे।

जब भी हिंदी फ़िल्मी गीतों की बात होती है तो या तो श्रेय गायक गायिका ले जाते हैं या संगीतकार। गीतकार को सिरे से इग्नोर कर दिया जाता है। 1944 में आई फ़िल्म “रतन” का ये गाना कितना मशहूर है – “अँखियाँ मिला के जिया भरमा के चले नहीं जाना” मगर इसे संगीतकार नौशाद के पहले सुपरहिट गीत के तौर पर जाना जाता है। और ख़ानदान फ़िल्म का ये गाना – “तू कौन सी बदली में मेरे चाँद है आजा” इसे मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के हिट गानों में गिना जाता है।

पर शायद ही किसी को इनके गीतकार का नाम याद हो। इन्हें और इन जैसे और भी कई मशहूर गाने लिखे हिंदी फ़िल्मी गीतकारों की पहली पीढ़ी के एक प्रमुख गीतकार पंडित दीनानाथ मधोक ने, जिन्हें D N मधोक के नाम से जाना जाता है। हिंदी फ़िल्मी गीतों में पूरबी भोजपुरी और अवधी के शब्दों को लाने वाले D N मधोक अपने ज़माने के इतने मशहूर गीतकार थे कि 40 के दशक में फ़िल्म इंडस्ट्री में उन्हें “महाकवि मधोक” की उपाधि दे दी गई थी। 

D N मधोक के करियर का शुरुआती दौर

D N मधोक सिर्फ़ गीतकार नहीं थे उन्होंने कई फ़िल्मों में अभिनय किया कुछ की पटकथा और संवाद लिखे और क़रीब 17 फ़िल्मों का निर्देशन भी किया। फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने से पहले D N मधोक ने कई साल रेलवे में काम किया। बहुआयामी प्रतिभा के धनी D N मधोक का जन्म हुआ 22 अक्टूबर 1902 को। उनका मन शुरू से लेखन, संगीत और महफ़िलों में लगता था और इसी वजह से वो अपनी B A की पढाई भी पूरी नहीं कर पाए।

जब उनके पिता ने देखा कि बेटे का मन पढ़ने में नहीं है तो उनके पिता जो पोस्ट मास्टर थे, उन्होंने रेलवे में उनकी क्लर्क की नौकरी दिला दी। पर D N मधोक का शौक़ कम नहीं हुआ, वो अपने गीतों का रिकॉर्ड निकलवाने की कोशिश में कोलकाता जा पहुँचे, उस समय बड़ी-बड़ी रिकॉर्ड कंपनियाँ कोलकाता में ही होती थीं। उन्होंने कई बड़ी ग्रामोफ़ोन कंपनियों में बात भी की मगर निराशा ही हाथ लगी। लेकिन जिस साल भारतीय सिनेमा में आवाज़ आई और गीत-संगीत का स्कोप दिखाई देने लगा, उसी साल D N मधोक भी मुंबई पहुँच गए। 

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आमतौर पर लोग फ़िल्मों में हीरो बनने जाते हैं मगर मौक़ा नहीं मिलता, पंडित जी  के साथ उल्टा हुआ वो गीतकार बनने गए थे मगर उन्हें अभिनय के प्रस्ताव मिलने लगे जिन्हें पहले तो उन्होंने ठुकराया मगर कुछ ही समय में ये बात समझ में आ गई कि अपनी मर्ज़ी का काम करने के लिए इंडस्ट्री में टिके रहना ज़रुरी है और यही सोचकर उन्होंने फ़िल्मों में अभिनय करना शुरु कर दिया।    

और फिर 1932 में आई फ़िल्म “राधेश्याम” जिसमें D N मधोक ने अभिनय तो किया ही, 29 गाने भी लिखे साथ ही फिल्म का स्क्रीनप्ले भी लिखा। अगले कुछ सालों तक वो गीत, संवाद और पटकथा लेखन के साथ साथ फ़िल्मों का निर्देशन भी करते रहे। या कहें कि जो भी काम मिला वो उन्होंने किया। क्योंकि फ़िल्म नगरी में क़दम जमाना उस दौर में भी आसान नहीं था।

फ़िल्मों में कामयाबी का सफ़र

20, 30, 40 के दशक तक तो यूँ भी स्टूडियो सिस्टम ही हावी था। D N मधोक को भी असली कामयाबी तब मिली जब 1939 में उन्होंने रणजीत मूवीटोन के साथ बतौर मल्टीटास्कर काम करना शुरू किया। वहां वो प्रोडूसर भी थे गीतकार भी और स्क्रीनप्ले और डायलॉग राइटर भी। वहां उन्होंने दिल का डाकू(36), दिलफ़रोश(37)[THREE WORRIORS], शमा परवाना(37) जैसी फिल्मों का निर्देशन किया। उनके निर्देशन में बनी एक फ़िल्म शराफ़ी लूट(37)[LURE OF GOLD] को अंग्रेज़ों ने बैन कर दिया था।

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इसके बाद से वो मुख्य रूप से लेखन से जुड़े रहे। नदी किनारे(39), मुसाफिर(40), पागल, उम्मीद ,बंसरी, आज का हिंदुस्तान (40) परदेसी (41) जैसी फ़िल्मों के गीतों ने उन्हें बतौर गीतकार पहचान दिलाई। लेकिन 1942 की “भक्त सूरदास” और 1943 की “तानसेन” में जब K L सहगल ने उनके लिखे गीत गाए तो बतौर गीतकार उनकी पहचान और भी मज़बूत हो गई। 40-50 के दशक में D N मधोक के लिखे गीत बहुत लोकप्रिय हुए।

D N मधोक
D N मधोक

हिंदी फ़िल्म जगत से नौशाद जैसे संगीतकार का परिचय कराने का श्रेय D N मधोक को ही जाता है। 1939 की पंजाबी फ़िल्म “मिर्ज़ा साहिबाँ” का निर्देशन उन्होंने किया था, जिसमें सहायक संगीतकार के रूप में उन्होंने नौशाद को मौक़ा दिया। संगीतकार के रूप में नौशाद की पहली फ़िल्म थी “प्रेम नगर” जिसके गीत D N मधोक ने लिखे। इसके बाद इस गीतकार-संगीतकार जोड़ी की मेला (41), शारदा(42), क़ानून(43) जैसी कई फिल्में आईं लेकिन सबसे मशहूर रही 1944 की “रतन” पर यही इस जोड़ी की आख़िरी फ़िल्म भी साबित हुई। 

D N मधोक ने 1932 से 1954 के बीच ख़ूबसूरत बला, वतनपरस्त, मास्टर फ़ाक़िर, शमाँ-परवाना, मिर्ज़ा-साहिबा, बिल्वामंगल और नाता जैसी क़रीब 18 फ़िल्मों का निर्देशन किया। उन्होंने मानसरोवर पिक्चर्स की नींव रखी और इसके बैनर तले दो फिल्मों का निर्माण किया -नाव और ख़ामोश सिपाही। इन दोनों फिल्मों का निर्देशन भी उन्होंने ही किया था। उनके निर्देशन में बनी आख़िरी फ़िल्म थी-1954 में आई बिल्वामंगल जिसके गीत भी उन्होंने ही लिखे थे। 

D N मधोक का दख़ल भले ही फ़िल्म निर्माण-निर्देशन, स्क्रीनप्ले और संवाद लेखन में भी रहा पर उनकी असल पहचान एक गीतकार की ही है। लगन(38), मुसाफिर(40), परदेसी(41), ख़ानदान(42), गीत(44), पहले आप(44), शीरीं फ़रहाद(45), परवाना(47), अनमोल रतन(50), तराना(51), गूँज(52),  समेत उन्होंने क़रीब 116 फिल्मों में 800 से ज़्यादा गीत लिखे। 

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Writing Style

वो ज़माना था जब खुलकर अपनी भावनाओं का इज़हार नहीं किया जाता था, फ़िल्मी गीतों में भी नहीं। इसलिए क़ुदरत के सहारे मन की भावनाओं को ज़ाहिर करने की कोशिश की जाती थी जिनमें पंछी, बादल, कोयल, पपीहा, चाँद, आम के पेड़ की बहुत अहम् भूमिका होती थी। और ये सब मधोक साहब के गीतों में मिलते हैं, साथ ही मिलती है एक आशा…… उनके विरह गीतों में भी एक उम्मीद की किरण दिखाई देती है। 

उन के लिखे गीतों की एक ख़ासियत है उनसे आती लोकगीतों की महक और वैसे ही सीधे-सादे बोल, तभी तो वो आसानी से आम इंसान की ज़ुबान पर चढ़ जाते थे। उनकी इसी विशेषता ने उन्हें उस मक़ाम पर पहुँचाया जहाँ वो इतने व्यस्त रहने लगे थे कि फोन पर भी गीत लिखवाया करते थे , क्योंकि उन्हें कहीं जाने का वक़्त नहीं मिलता था। कहते हैं कि वो जब संगीतकार को गीत लिख कर देते थे तो कई बार धुन भी गुनगुना कर बता देते थे, जिन्हें बहुत से संगीतकार बाद में अपने हिसाब से improvise करके इस्तेमाल भी कर लेते थे। 

लेकिन इसे विडंबना ही कहेंगे कि अपने समय के इतने मशहूर गीतकार के नाम तक से लोग वाक़िफ़ नहीं है। 50 का दशक गीतकारों की नई जमात लेकर आया, जिसमें मजरुह सुल्तानपुरी, शकील बदायूँनी और साहिर लुधियानवी जैसे नाम शामिल थे, D N मधोक जैसे गीतकारों का वक़्त ख़त्म हो रहा था, उस पर उनकी शराब की आदत। फिर भी उन्होंने 50- 60 के दशक तक फ़िल्मों में गीत लिखे, “समय बड़ा बलवान” वो आख़िरी फ़िल्म थी जिसमें उनके लिखे गीत सुनाई दिए और इसके बाद वो फ़िल्मी दुनिया से दूर गुमनामी के अँधेरों में खो गए।

इन्हीं अंधेरों में 9 जुलाई 1982 को हैदराबाद में 80 साल की उम्र में वो इस फ़ानी दुनिया से कूच कर गए। लेकिन जब तक उनके लिखे गीत गुनगुनाए जाएंगे तब तक वो भी हमारी यादों में ज़िंदा रहेंगे। 

D N मधोक के कुछ गीत

  • पंछी जा – शारदा (1942) – सुरैया – नौशाद – D N मधोक
  • तू कौन सी बदली में मेरे चाँद है आजा – ख़ानदान (1942) – नूरजहाँ – ग़ुलाम हैदर
  • अँखियाँ मिला के – रतन (1944) – ज़ोहराबाई अम्बालेवाली – नौशाद – D N मधोक
  • जब तुम ही चले – रतन (1944) – कारण दीवान – नौशाद – D N मधोक
  • चले गए चले गए – पहले आप (1944) – ज़ोहराबाई अम्बालेवाली – नौशाद – D N मधोक
  • जब बादल घिर-घिर आएंगे – डाक बंगला (1947) – सुरैया मुकेश – नरेश भट्टाचार्य
  • मैंने देखी जग की रीत – सुनहरे दिन (1949 ) – शमशाद बेगम मुकेश – ज्ञान दत्त – D N मधोक
  • बेईमान तोरे नैनवा निंदिया न आए – तराना (1951) – लता – अनिल बिस्वास
  • मेरी ज़िंदगी में तुम क्यों आये – गूँज (1952) – सुरैया – सर्दुल क्वात्रा
  • हम इश्क़ के मारों को – बिल्वामंगल (1954) – सुरैया – बुलो C रानी

By Neetu

Neetu Sharma is working in different fields of media for more than 21 years. Painter turned TV Host, Radio Jockey, Content Writer, and now YouTuber, and blogger.

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