महमूद

महमूद वो हास्य कलाकार थे जिनमें ग़ज़ब का कॉमिक सेन्स था, वो दर्शकों की नब्ज़ को पहचानते  थे इसलिए उनके परदे पर आते ही आपके चेहरे पर एक मुस्कान खुद-ब-ख़ुद आ जाती थी। फिर चाहे वो कोई फिल्म का सीन हो या कोई गाना। उनका होना किसी भी फ़िल्म की सफलता की गारंटी माना जाता था। उनकी उपस्थिति से हीरो भी घबराते थे, क्योंकि वो अपनी कॉमेडी का रंग इस तरह जमाते कि फ़िल्म में चाहे कितने ही कलाकार हों, दिल पर उनकी ही छाप रह जाती थी। एक वक़्त था जब फ़िल्म में उनके लिए ख़ासतौर पर रोल लिखवाए जाते थे और उनके लिए गाने की सिचुएशन भी बनाई जाती थी।

वो एक ऐसे एक्टर थे, जो दर्शकों को अपनी एक्टिंग से खूब हँसाते थे और खूब रुलाते भी थे. उनके डायलॉग सुनकर अच्छे से अच्छे अभिनेता के पसीने छूट जाते थे। वो जब भी फिल्म का कोई शॉट देते, किसी को पता नहीं होता था कि वो अब क्या बोल देंगे और कैसे उस सीन को करेंगे। जब शूट ख़त्म होता तो महमूद के लिए जमकर तालियां बजाईं जाती थीं। महमूद अकेले ऐसे हास्य कलाकार थे, जिनकी तस्वीर फ़िल्मी पोस्टर में हीरो के साथ रहा करती थी। फ़िल्म में कितना भी बड़ा हीरो क्यों न हो, दर्शक सिनेमाघरों में महमूद को देखने जाया करते थे।

महमूद का मनना था कि वो एक अच्छे एक्टर नहीं अच्छे मिमिक थे, जिस तरह के लोगों को देखते थे उनके स्टाइल को अपनी एक्टिंग स्टाइल में ढाल लेते थे। वो बहुत ही स्पॉनटेनियस थे, अपने गेटअप के साथ-साथ आवाज़ को बदलने में माहिर। कोई किरदार किस क्षेत्र से है, उस जगह के लोगों का बातचीत का एक्सेंट क्या है इसका वो बहुत ख़याल रखते थे। इसका एक उदहारण है फिल्म “वरदान”। 

“वरदान” फ़िल्म में किरदार के बोलने का स्टाइल बहुत अलग क़िस्म का था और उस किरदार पर एक गाना भी फिल्माया जाना था लेकिन जिस तरह की आवाज़ में वो किरदार बोलता था उसमें गाना कैसे गाया जाए ये बड़ी मुश्किल बन गई थी। तब ख़ुद महमूद ने उस गाने को उसी एक्सेंट में गाया।    

महमूद
पिता मुमताज़ अली और महमूद

महमूद के पिता भी अपने ज़माने के स्टार थे

महमूद का जन्म 29 सितम्बर 1932 में हुआ। उनके पिता मुमताज़ अली 40 के दशक के एक मशहूर स्टेज और सिनेमा के कलाकार थे और बहुत अच्छे डांसर भी। मुमताज़ अली ने एक समय में बहुत कुछ कमाया , नेम फेम मनी सब में वो किसी भी बड़े स्टार से कम नहीं थे। उनके पास कई गाड़ियाँ थीं उन्होंने एक बड़ी इमारत बनवाई थी ‘मुमताज़ मंज़िल’ के नाम से जिसमें उन्होंने अपने आठ बच्चों के लिए अलग-अलग आठ फ़्लोर बनवाए थे। 

मगर जब ज़िंदगी में उतार-चढाव आए तो उन्होंने शराब को अपना सहारा बना लिया और फिर ये लत इस हद तक बढ़ गई कि घर गाड़ियाँ सब बिक गए, ये नौबत आ गई कि उनके क़रीबी दोस्तों ने भी उनसे किनारा कर लिया। उन लोगों को एक ऐसे घर में जाकर रहना पड़ा जहाँ दरवाज़ों की जगह चादर डालनी पड़ती थी। इसीलिए उनकी पत्नी को फ़िल्म लाइन से नफ़रत थी और वो नहीं चाहती थीं कि उनका कोई बच्चा कभी भी सिनेमा या थिएटर से जुड़े।

महमूद बतौर बाल कलाकार इस फिल्म में दिखे थे

महमूद बचपन से ही काफ़ी शरारती और आउट स्पोकन थे। कहा जाता है कि उनके शरारती अंदाज के चलते ही उन्हें 1943 की फिल्म किस्मत में बतौर बाल कलाकार काम करने का मौका मिला। हुआ यूं कि एक दिन इस फिल्म के हीरो अशोक कुमार शूटिंग कर रहे थे। फिल्म में एक बाल कलाकार की जरूरत थी, जो अशोक कुमार के बचपन का रोल निभा सके। एक दिन स्टूडियो के बाहर अशोक कुमार को एक बच्चा खेलता हुआ मिला. उसके नटखट अंदाज पर अशोक कुमार फिदा हो गए और उन्होंने उस बच्चे को अपनी फिल्म में काम करने का मौका दे दिया, इस तरह महमूद के फिल्मी करियर की शुरुआत हुई।

महमूद

ज़िन्दगी और फिल्मों में संघर्ष का दौर

इसके बाद महमूद ने सन्यासी और नादान नामक फिल्म में काम किया, लेकिन उनका करियर उन ऊंचाइयों को नहीं छू पा रहा था, जिसकी आस उन्हें थी। हालांकि, महमूद ने हार नहीं मानी, उनका संघर्ष जारी रहा. चूंकि, पिता मुमताज अली भी फिल्मों से ताल्लुक रखते थे, तो वह भी काम की तलाश में इधर उधर घूमते रहते थे। ये वो वक़्त था जब महमूद के परिवार की माली हालत इतनी खराब थी कि उन्हें दो वक्त का खाना भी बहुत मुश्किल से नसीब होता था।

महमूद ने बहुत ही कम उम्र से काम करना शुरू कर दिया था और फ़िल्मों में अपना सिक्का जमाने से पहले उन्होंने कई तरह के काम किए। अंडे बेचे, निर्माता निर्देशक और गीतकार पी एल संतोषी के ड्राइवर की नौकरी भी की, लेकिन यह काम कुछ महीने में ही उनके हाथ से निकल गया। और ये तो सभी जानते हैं कि वो मीना कुमारी को टेबल टेनिस सिखाया करते थे। उन्हें सिखाते-सिखाते उनकी बहन मधु से मोहब्बत हो गई और दोनों ने शादी कर ली और जल्दी ही एक बेटे के पिता भी बन गए।

परिवार बढ़ने के बाद उन्हें लगा कि कुछ अलग काम करना पड़ेगा जिससे परिवार का गुज़ारा अच्छी तरह हो सके। और फिर उन्होंने फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल करना शुरु कर दिया। पहला मौक़ा मिला देवानंद की CID में फिर गुरुदत्त की प्यासा जैसी कुछ और फ़िल्मों में छोटे- छोटे रोल किये। पर पहली बार बतौर एक्टर पहचान मिली 1958 में आई फ़िल्म “परवरिश” में, और “छोटी बहन” से उनके फ़िल्मी सफ़र ने रफ़्तार पकड़नी शुरु कर दी। इस फ़िल्म में उनका नाम था “महेश” जिसे वो अपना लकी नाम मानते थे। 60 का दशक शुरु होते-होते महमूद की किस्मत बदलनी शुरु हो गई। “शबनम” जैसी कुछ फ़िल्मों में उन्होंने लीड रोल भी किए, बतौर हीरो नज़र आए।

फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड पाने वाले पहले कॉमेडियन

“दिल तेरा दीवाना” में शम्मी कपूर के साथ उनके अभिनय को इतना पसंद किया गया कि उन्हें फ़िल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार दिया गया। क्योंकि तब तक फ़िल्मफ़ेयर में कॉमिक रोल्स के लिए कोई कैटेगरी नहीं थी लेकिन जब हास्य कलाकारों के पुरस्कार शुरू हुए तो सबसे पहला पुरस्कार महमूद को दिया गया फ़िल्म “प्यार किए जा” के लिए। ये वही फ़िल्म है जिसमें वो आइकोनिक सीन है जब महमूद अपनी डरावनी फिल्म की कहानी अपने पिता ओम प्रकाश को इस तरह सुनाते हैं कि सुनकर ही उनकी चीख़ निकल जाती है और देखने वालों की भी साँस अटकी रह जाती है।

कामयाबी का दौर

महमूद
महमूद और R D बर्मन

एक्टिंग के साथ-साथ ही महमूद ने फिल्मों का निर्माण भी शुरु कर दिया था। “छोटे नवाब” में उनका लीड रोल था और इस फ़िल्म में उन्होंने बतौर संगीतकार R D बर्मन को चांस दिया था। पंचम ही नहीं सदी के सुपर स्टार अमिताभ बच्चन को भी कमर्शियल सिनेमा में एंट्री उनकी फ़िल्म “बॉम्बे टू गोवा” से मिली। इस फ़िल्म में उनके अभिनय को देखकर ही सलीम-जावेद ने ज़ंजीर के लिए अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था। इसके बाद महमूद ने “भूत-बंगला बनाई और फिर आई आइकोनिक कॉमेडी “पड़ोसन” जिसमें वो co-producer थे। फ़िल्म में हरेक कलाकार ने हास्य के रंग बिखेरे थे और एक-एक सीन लाजवाब है और गाने तो एक से बढ़कर एक है।

60 का दशक हास्य में महमूद के नाम रहा उनकी और शुभा खोटे की जोड़ी ने लोगों को ख़ूब हंसाया, उनकी जोड़ी अरुणा ईरानी के साथ भी खूब जमी। ये उनकी कामयाबी का पीक था उनकी फ़ीस हीरो से ज़्यादा हुआ करती थी। उनके पास कई-कई गाड़ियां थीं और वो अपने कपड़ों और जूतों से मैच करती हुई गाड़ी का इस्तेमाल करते। घोड़ों का भी उन्हें बहुत शौक़ था और सिर्फ़ घोड़ों के लिए उन्होंने एक फार्म हाउस ख़रीदा था। 

70 का दशक आते-आते महमूद ने ख़ुद अपने लिए फ़िल्में बनाना शुरु किया, ऐसी फ़िल्में जिनमें वो अपने अभिनय की रेंज दिखा सकें। 1974 में आई फ़िल्म “कुँवारा बाप” जिसका निर्देशन महमूद ने किया था। ये फ़िल्म उन्होंने अपने पोलियो के शिकार बेटे से प्रेरित होकर बनाई थी और फ़िल्म में उस बच्चे का रोल भी उनके बेटे ने किया था। इस फ़िल्म राजेश रोशन ने बतौर संगीतकार अपना सफ़र शुरु किया था।

फिर उन्होंने “सबसे बड़ा रुपैया” बनाई, “जिनी और जॉनी” और “एक बाप छह बेटे” का निर्देशन किया जिसमें उनकी दूसरी पत्नी और 6 बेटों ने अभिनय किया था। मगर ये फिल्में कुछ ख़ास नहीं चलीं। और 80 का दशक आते-आते महमूद ने फ़िल्मों में काम करना काफ़ी कम कर दिया। आख़िरी बार वो 1994 की फ़िल्म “अंदाज़ अपना-अपना” में दिखाई दिए। 

महमूद

महमूद का निजी जीवन

महमूद की पहली शादी मीना कुमारी की बहन मधु से हुई थी मगर ये शादी ज़्यादा वक़्त नहीं चली। इस शादी से उनके चार बेटे हुए जिनमें से मक़सूद यानी लकी अली ने गायकी में अपनी एक ख़ास पहचान बनाई। उन्होंने दूसरी शादी की एक अमेरिकन महिला ट्रेसी से। उनके तीन बच्चे हुए और इनके अलावा एक लावारिस लड़की की भी थी, जिसकी उन्होंने परवरिश की। महमूद ने अपनी फ़िल्मों के ज़रिए हमेशा  लोगों को हँसाया मगर ख़ुद उनकी ज़िंदगी में हमेशा परेशानियाँ ही रहीं। 

उनका बेटा मकदूम अली, जिन्हें सब प्यार से मिक्की अली बोलते थे. वो पोलियो के शिकार हो गए। महमूद ने उनके इलाज के लिए क्या कुछ नहीं किया, उन्हें विदेश ले गए काफी पैसा खर्च किया, लेकिन फिर भी वो ठीक नहीं हो पाए तो उन्होंने अपना दुःख अपनी फ़िल्म “कुँवारा बाप” में दिखाया”

आखिरी दिनों में भी वो काम के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ। बीमार होने के बावजूद भी स्टेज शो और फिल्मों में अपनी रुचि दिखाते थे। वो हमेशा कहा करते थे कि “ज़िन्दगी गमों का एक सागर है, तैरकर जाना है, चाहे कुछ भी हो जाए, हर हाल में मुस्कराते रहो।”फेफ़ड़ों में ख़राबी आने की वजह से वो पेंसिलवेनिया चले गए थे अपना इलाज कराने के लिए। वहीं 2004 में 23 जुलाई को महमूद ने आख़िरी साँस ली। और सबको हंसाने वाला अपने समय का कॉमेडी स्टार इस दुनिया को अलविदा कह गया। 

महमूद ने हमेशा मदद का हाथ बढ़ाया

आज फ़िल्मी हलकों में फिल्म स्टार सलमान ख़ान “भाईजान” या भाई नाम से मशहूर हैं, मगर महमूद हिंदी फिल्मों की वो पहली शख़्सियत थे जिन्हें हर कोई भाईजान कहकर बुलाता था। क्योंकि वो सबका भाई की तरह ख्याल रखते थे और जब भी किसी को मदद की ज़रुरत होती वो ज़रुर मदद करते। यही नहीं उन्होंने कई लोगों को फ़िल्मों में काम करने का मौक़ा भी दिया। 

महमूद
अमिताभ बच्चन और महमूद

आर डी बर्मन अमिताभ बच्चन ये दो बड़े नाम हैं, जिनकी प्रतिभा को सबसे पहले महमूद ने पहचाना।अमिताभ बच्चन को बतौर सोलो हीरो सबसे पहले महमूद ने ही मौक़ा दिया। अमिताभ बच्चन जब शुरुआती दिनों में संघर्ष कर रहे थे तो महमूद के भाई अनवर अली ने दोनों की मुलाक़ात करवाई और महमूद ने ही अमिताभ को लंबे समय तक अपने घर पर आसरा दिया। 

By Neetu

Neetu Sharma is working in different fields of media for more than 21 years. Painter turned TV Host, Radio Jockey, Content Writer, and now YouTuber, and blogger.

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