Birbal ki Khichdi

बीरबल की खिचड़ी एक ऐसी कहावत है जो उस काम के लिए इस्तेमाल की जाती है जिस के पूरा होने में बहुत देर हो रही हो।

बीरबल की खिचड़ी

बीरबल की खिचड़ी आख़िर कहावत कैसे बनी

बीरबल की खिचड़ी की कहावत बनने के पीछे एक बड़ा ही रोचक क़िस्सा है। कड़कड़ाती हुई सर्दियों की शाम थी। बादशाह अकबर और बीरबल आपस में बात कर रहे थे। अचानक अकबर की नज़र यमुना नदी की ओर गई, सर्दी की रात में जब पानी के नाम से ही ठन्ड लगने लगती है, तो अकबर ने पानी की तरफ़ देखकर पूछा – इतनी ठंड में क्या कोई व्यक्ति यमुना नदी के ठंडे पानी में रात भर खड़ा रह सकता है ? बीरबल बोले- क्यों नहीं जहाँपनाह ! ऐसे बहुत से लोग मिल जाएँगे।

क़ाबिल व्यक्ति की तलाश 

बादशाह की ख्वाहिश हो और उस पर अमल न हो ऐसा कैसे हो सकता है ! तो तुरंत ऐसे व्यक्ति की तलाश शुरू हुई जो कड़कड़ाती ठण्ड में नदी के जमा देने वाले पानी में रात भर खड़ा रह सके। संयोग से बीरबल को ऐसा व्यक्ति मिल भी गया। बीरबल ने उससे पूछा क्या तुम रात भर यमुना नदी के ठन्डे पानी में खड़े रह सकते हो ?

उस व्यक्ति ने कहा – क्यों नहीं अगर इच्छा शक्ति हो तो मैं क्या कोई भी खड़ा हो सकता है। ये सुनकर बीरबल ने उस व्यक्ति से कहा तो तुम आज रात महल में पहुँच जाना, मैं तुम्हें बादशाह से मिलवा दूंगा और उन्हीं के सामने तुम्हें पानी में उतरना होगा। ऐसी कोई चुनौती हो तो इनाम मिलना तय होता है यही सोचकर उस व्यक्ति ने बीरबल से कहा – जैसी आपकी आज्ञा, मैं समय पर पहुँच जाऊँगा।

वो व्यक्ति रात के वक़्त सही समय पर महल में बादशाह और बीरबल के सामने उपस्थित हो गया। वो उन दोनों के सामने पानी में उतरा, अकबर और बीरबल तो अपने-अपने घर चले गए लेकिन रात भर सैनिक उस पर कड़ी नज़र रखते रहे। वो व्यक्ति रात भर नदी के थोड़े पानी में पूरी तन्मयता के साथ खड़ा रहा। जब कुछ पाने की उम्मीद होती है तो यूँ भी इंसान अपना सौ प्रतिशत देता है यही उसने भी किया, और इसी तरह सुबह हो गई।  

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अगली सुबह वो व्यक्ति कार्य सफल होने पर ख़ुशी-ख़ुशी नदी से बाहर निकला और फिर उसे अकबर के सामने उपस्थित किया गया। अकबर ने थोड़ी जिज्ञासा के साथ उस व्यक्ति से पूछा – तुम इतनी ठंड में रात भर पानी में कैसे खड़े रहे ?

वो व्यक्ति थका हुआ तो था मगर इनाम की उम्मीद में बड़े उत्साह के साथ बोला – जहाँपनाह ! मैं तो रात भर ईश्वर का नाम लेता रहा और यमुना पार जलते दिए को देखता रहा।

इतना सुनते ही अकबर ने तपाक से कहा – अच्छा ! तो तुम उस दिए की लौ से गर्मी लेते रहे। बादशाह की ये बात सुनकर सभी दरबारियों को बड़ा ही अजीब लगा। मगर कोई कुछ नहीं बोला, भई वो बादशाह थे दिल्लगी करना किसी की मेहनत को नज़रंदाज़ करना तो उनका हक़ था।

बादशाह की बात सुनकर वो व्यक्ति भी बड़ा निराश हुआ, कहाँ तो वो किसी बड़े ईनाम की उम्मीद कर रहा था, कहाँ उसकी कोशिश और मेहनत को ही नज़रअंदाज़ कर दिया गया। इस कोशिश में उसकी जान भी जा सकती थी, वो बुरी तरह बीमार भी पड़ सकता था। मगर…. अकबर की बात सुनकर बीरबल को भी अजीब लगा, थोड़ा ग़ुस्सा भी आया मगर बादशाह के सामने वो अपने ग़ुस्से का इज़हार तो कर नहीं सकते थे इसलिए ख़ामोश रहे। 

बीरबल की ग़ैरहाज़िरी 

अगले दिन जब दरबार लगा तो बीरबल वहाँ मौजूद नहीं थे, आमतौर पर बीरबल अनुपस्थित यानी गैरहाज़िर नहीं होते थे। बादशाह के आने से पहले बीरबल हमेशा वहां मौजूद होते थे इसलिए बादशाह को थोड़ा अचंभा हुआ। उन्होंने कुछ देर इंतज़ार किया, लेकिन जब काफ़ी देर हो गई और वो दरबार में नहीं पहुँचे तो बादशाह ने बीरबल को संदेशा भिजवाया।

बीरबल ने संदेशवाहक को कहा कि जाकर कह दो – बीरबल खिचड़ी बना रहे हैं, बीरबल की खिचड़ी पकते ही दरबार में हाज़िर हो जाएँगे। जब काफी समय और बीत गया, बीरबल तब भी दरबार में नहीं आये तो बादशाह ने एक बार फिर सन्देश भिजवाया। सन्देश वाहक ने आकर जवाब दिया कि अभी बीरबल की खिचड़ी पकी नहीं है। जब भी सन्देश वाहक को भेजा गया हर बार उसने यही कहा कि अभी बीरबल की खिचड़ी पक रही है। 

ऐसा 2-3 बार हुआ तो बादशाह सोचने लगे कि ये बीरबल की खिचड़ी कैसी बन रही है कि इतना वक़्त लग रहा है! जब शाम तक बीरबल दरबार में नहीं आए तो बादशाह ख़ुद उन के घर पहुँच गए। देखते क्या हैं कि चूल्हा तो नीचे ज़मीन पर जल रहा था मगर खिचड़ी की हांडी बहुत ऊँचाई पर लटकी हुई थी, जहाँ तक चूल्हे की आँच पहुँच ही नहीं पा रही थी। और बीरबल एक तरफ बैठ कर उसके पकने का इंतज़ार कर रहे हैं। 

बीरबल की खिचड़ी
बादशाह ने कहा कि इस तरह तो बीरबल की खिचड़ी कभी नहीं पकेगी

ये देखकर बादशाह को बहुत हँसी आई उन्होंने बीरबल की तरफ़ देखा और मज़ाक़ उड़ाते हुए कहा इस तरह तो बीरबल की खिचड़ी कभी भी नहीं पकेगी। बीरबल ने उसका स्वागत किया और पूछा क्यों जहाँपनाह ? क्यों नहीं पकेगी बीरबल की खिचड़ी ? बादशाह ने कहा – तुमने खिचड़ी की हांड़ी चूल्हे से इतनी ऊपर जो लटकाई हुई है। फिर समझाने वाले अंदाज़ में बोले – तुम्हीं सोचो, भला इतनी ऊँचाई तक चूल्हे की आग की गर्मी पहुँचेगी कैसे ?

बीरबल तो जैसे यही सुनना चाहते थे, उन्होंने तपाक से कहा – क्यों नहीं जहाँपनाह ! जब यमुना पार जलते दिए की लौ से  कड़कड़ाती ठण्ड में एक आदमी को गर्मी मिल सकती है, तो बीरबल की खिचड़ी भी पक सकती है, ये हाँडी तो थोड़ी ही ऊँचाई पर है।

ये सुनकर अकबर को अपनी ग़लती का अहसास हुआ और और वो समझ गए कि बीरबल ने खिचड़ी का ये नाटक उन्हें उनकी ग़लती का एहसास दिलाने के लिए ही किया था। बादशाह ने तुरंत अपनी ग़लती सुधारी और उस व्यक्ति को बुलाकर ढेरों इनाम से नवाज़ा। 

Video of This Hindi Proverb – बीरबल की खिचड़ी

जनता के बीच भी ये क़िस्सा बहुत मशहूर हुआ और तभी से बीरबल की खिचड़ी की कहावत चल पड़ी। ऐसी ही छोटी बड़ी घटनाएँ कहावतों का रूप ले लेती हैं उन्हीं कहावतों की कहानियाँ मैं आपसे बाँट रही हूँ। 

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By Neetu

Neetu Sharma is working in different fields of media for more than 21 years. Painter turned TV Host, Radio Jockey, Content Writer, and now YouTuber, and blogger.

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