अंजान

अंजान जिन्होंने अपने गीतों से बनारसी पान का स्वाद याद दिलाया तो पैसों की चमक-दमक में खोकर रिश्तों की मिठास के कम होने का दुःख भी छलकाया। वहीं हक़ीक़त से परे रोमांटिक गीतों में भी अपना जलवा बिखेरा।

जग अभी जीता नहीं है मैं अभी हारा नहीं हूँ

फ़ैसला होने से पहले हार क्यों स्वीकार कर लूँ !

अंजान

अंजान ने ऐसी कितनी ही प्रेरणादायक रचनाओं के अलावा बहुत से हिट पेपी सांग्स भी लिखे हैं, बल्कि उनकी लोकप्रियता ऐसे ही गानों से बढ़ी जो आमजन को बेहद अपने से लगे। मशहूर गीतकार अंजान को इंडस्ट्री में हिंदी का कवि माना जाता था क्योंकि उनके गानों में उत्तर प्रदेश और भोजपुरी के शब्दों का प्रयोग काफी होता था, पर उन्होंने उदासी भरे, दार्शनिक, रोमेंटिक हर तरह के गीत लिखे हैं।

अंजान

अंजान कॉलेज के ज़माने से ही कविता करने लगे थे

28 अक्टूबर 1930 में वाराणसी में जन्मे लालजी पाण्डेय जब कविता करने लगे तो “अंजान” बन गए। अंजान उनका उपनाम जो असल में उनका नाम बना। कविता का शौक़ उन्हें पढाई के दौरान ही हो गया था, और इस हुनर ने उन्हें दोस्तों के बीच काफ़ी लोकप्रिय बना दिया था, फिर भी कभी उनकी ख़्वाहिश मुंबई जाकर गीतकार बनने की नहीं थी, वो तो बैंक की नौकरी करना चाहते थे। एक बार जब गायक मुकेश वाराणसी गए हुए थे तो अंजान के एक दोस्त ने दोनों की मुलाक़ात करा दी। जब अंजान ने अपनी कविता मुकेश को सुनाई तो वो उन की कविताओं से काफ़ी प्रभावित हुए और उन्हें मुंबई आने का न्योता दे दिया।

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तब भी अंजान के मन में मुंबई जाने और फ़िल्मी गीतकार बनने का कोई का ख्याल नहीं आया पर क़िस्मत में तो यही लिखा था तो हालात भी वैसे ही बनते चले गए। उन्हें अस्थमा की बीमारी थी और एक बार उनकी तबियत इतनी ज़्यादा ख़राब हो गई कि ठीक ही नहीं हो पा रही थी, तब डॉक्टर ने उन्हें किसी समंदर किनारे बसी जगह पर जाकर रहने की सलाह दी ताकि उनका स्वास्थ्य ठीक रह सके।

इसी के बाद वो मुंबई पहुंचे, जहाँ एक अलग ही संघर्ष था। ज़्यादा पैसे थे नहीं उनके पास, न ही कोई ज़्यादा जान-पहचान थी। पहले कुछ लोगों के साथ एक गेस्ट हाउस में रहे बाद में कभी रात लोकल ट्रेन में गुज़रती तो कभी किसी अपार्टमेंट की सीढ़ियों के नीचे। कहते हैं इस दौरान उन्होंने बच्चों को पढ़ाया भी, वो बहुत ही कड़ा वक़्त था अंजान जब मुंबई पहुंचे तो काम के सिलसिले में कितने ही लोगों से मिले पर कहीं कोई बात बन ही नहीं पा रही थी।

अंजान

एक बार किसी ने उन्हें अभिनेता-फ़िल्मकार प्रेमनाथ से मिलवाया जो उन दिनों एक फ़िल्म बना रहे थे “गोलकुंडा का क़ैदी” उस फ़िल्म में अंजान को गीत लिखने का मौक़ा मिल गया। गीत लिखने का मेहनताना मिला 500 रूपए पर न तो फ़िल्म चली न उस का संगीत चला और अंजान फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए “अंजान” ही रह गए। फिर उन्होंने लम्बे हाथ जैसी कई छोटे बजट की फ़िल्मों के लिए भी गीत लिखे पर उनसे कोई पहचान हासिल नहीं हुई।

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पहली बार उनके हुनर को पहचान मिली फिल्म “गोदान” के गीतों से। इस फिल्म में पं० रविशंकर का संगीत था, और ये प्रेमचंद के उपन्यास पर आधारित थी, इसीलिए कोई ऐसा गीतकार चाहिए था जो उसी भाषा में गीत लिख सके और ये काम अंजान ने बख़ूबी किया। पर ये फिल्म भी नहीं चली, मगर इसका गीत-संगीत काफी लोकप्रिय हुआ और इसका कुछ फ़ायदा उन्हें हुआ भी। अब वो इंडस्ट्री के लिए “अंजान” नहीं रह गए थे।

गोदान से मिली पहचान और डॉन ने उन्हें लोकप्रियता दिलाई 

“गोदान” फिल्म से उनके नाम को पहचान मिली और उसके बाद उन्हें बड़े बैनर की फिल्में भी मिलने लगीं। पर उनकी पहचान एक ऐसे गीतकार की बनने लगी थी जो सिर्फ़ हिंदी भोजपुरी या U P के डायलेक्ट वाले गीत ही लिख सकता है।  ऐसे में उन्हें मिली गुरुदत्त प्रोडक्शंस की फ़िल्म “बहारें फिर भी आएँगी” इसका एक बहुत मशहूर गाना है “आपके हसीन रुख पे आज नया नूर है” इसे मोहम्मद रफ़ी ने गाया था। इसे लिख कर उन्होंने साबित किया कि वो उर्दू अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल भी बख़ूबी कर सकते हैं।

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वो फ़िल्म जिसने अंजान को कल्याणजी आनंदजी जैसी संगीतकार जोड़ी का साथ दिलाया। वो थी G P सिप्पी की “बंधन” इसमें राजेश खन्ना पर फिल्माया गाना “बिना बदरा के बिजुरिया कैसे चमके” बहुत ही मशहूर हुआ था। इसके बाद अंजान को कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा लेकिन अभी उनका सुनहरा दौर आना बाक़ी था। वो दौर तब आया जब उनकी एक सुपरहिट टीम बनी। एक ज़माना था जब गीतकार अंजान संगीतकार कल्याणजी आनंदजी, फ़िल्मकार प्रकाश मेहरा और अभिनेता अमिताभ बच्चन की ये पूरी टीम कामयाबी की गारंटी मानी जाती थी।

अंजान ने अमिताभ बच्चन के लिए पहली बार फ़िल्म “दो अनजाने” के गाने लिखे, उसके बाद जब प्रकाश मेहरा ने “हेरा-फेरी” फिल्म बनाई तो उसके गाने भी अंजान से लिखवाए और फिर तो “ख़ून-पसीना”, “मुक़द्दर का सिकंदर”,”लावारिस”, “डॉन” जैसी कई सुपरहिट आईं। “डॉन” के गानों ने अंजान को रातों-रात मशहूर कर दिया और उनके देसी अंदाज़ ने हर सुनने वाले पर जादू चलाया। डॉन का गाना है – “खइके पान बनारस वाला खुल जाए बंद अकल का ताला” इस गाने के बारे में ये तो हम सब जानते हैं कि जब किशोर दा ये गाना रिकॉर्ड करने वाले थे तो उन्होंने सच में पान का बीड़ा अपने मुंह में रखा था।

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लेकिन ये बात शायद आप न जानते हों कि जब अंजान ने किशोर दा को ये बोल दिए तो इसमें जो “खईके” शब्द है न, उस पर किशोर दा को थोड़ी आपत्ति हुई। उन्होंने कहा कि इसे “खइके” क्यों बोला जाए हम इसे “खा के” भी तो बोल सकते हैं। इस बात को लेकर काफी बहस हुई पर जब अंजान ने समझाया कि इसका सही डायलेक्ट और मज़ा “खइके” में ही आएगा तो किशोर दा ने कहा कि मैं सिर्फ़ एक बार इसे बोलूंगा अगर उसमें सही नहीं आया तो दोबारा रिकॉर्ड नहीं करूँगा। और फिर एक बार में ये गाना रिकॉर्ड हुआ।

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वो दौर अमिताभ बच्चन का था, उस समय वो सुपरस्टार थे और उन की लगभग हर फ़िल्म के गीत अंजान ही लिखते थे, फिर म्यूज़िक डायरेक्टर या निर्माता-निर्देशक कोई भी हो इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। “नमक हलाल” हो या “याराना” या फिर “शराबी” अमिताभ बच्चन के लिए अंजान के लिखे कितने ही गाने बहुत मशहूर हुए। 

क़रीब बीस सालों तक हिंदी फ़िल्मों में हर तरह के गीत लिखने वाले गीतकार अंजान ने कल्याणजी आनंदजी के अलावा और भी कई संगीतकारों के लिए गीत लिखे जिनमें बप्पी लहरी, R D बर्मन, राजेश रोशन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से लेकर अन्नू मलिक तक लगभग सभी बड़े संगीतकारों के नाम आप ले सकते हैं। उनके गीतों में उत्तर प्रदेश और भोजपुरी के लोकल डायलेक्ट के इस्तेमाल ने उन्हें उस दौर में एक अलग ही पहचान दिलाई। अगर आप ग़ौर करें तो उनके कई गानों में गंगा का प्रयोग मिलता है। समंदर किनारे रहकर भी वो गंगा का किनारा भूल नहीं पाए थे, इसीलिए अपने गानों में कई बार अंजान ने “गंगा” का प्रयोग किया।

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उनके बाद के दौर के गीत शुद्ध व्यवसायिक श्रेणी में रखे जाते हैं, पर जब भी उन्हें संवेदनशील या भावुक गीत लिखने का मौक़ा मिला तो उन्होंने बहुत ही सुन्दर गीत लिखे। बाद की फ़िल्मों में भी अगर मिसाल के तौर पर लें तो फ़िल्म “संजोग”, “ईश्वर” , “एक जान हैं हम” में भी उन्होंने बहुत अच्छे गाने लिखे। हिंदी के अलावा उन्होंने भोजपुरी फिल्मों के गीत भी लिखे और कुछ ग़ैर-फ़िल्मी एलबम्स के लिए भी लिखा जिनमें “श्यामसागर मयूरपंख” और एक एल्बम “मैं कब गाता” जो अपने समय में बहुत ही लोकप्रिय हुई थी।

अंजान

सिचुएशन में बंधे रहना फ़िल्मी गीतकारों की मजबूरी होती है, व्यावसायिक पक्ष पर भी ध्यान देना पड़ता है और वक़्त की मांग भी पूरी करनी पड़ती है। जो अंजान ने की भी मगर इस बात का उन्हें अफ़सोस भी रहा। डिस्को डाँसर के गाने हम सबको बहुत पसंद हैं मगर एक कवि की नज़र से देखें तो वो उनके स्तर के गीत नहीं थे इसीलिए उन्होंने कहा था कि “ऐसा लग रहा है जैसे मैं अपने क़लम के साथ दुष्कर्म कर रहा हूँ” दूसरों के लिए उनकी पसंद का, उनके हिसाब से लिखने की टीस उनके मन में हमेशा बनी रही। और कितने ही अर्थपूर्ण गीत लिखने पर भी उन्हें कभी अवॉर्ड नहीं दिया गया इसका दुःख भी उन्हें सालता रहा। 

इसीलिए 90 का दशक आते-आते जब उनके बेटे समीर ने भी फ़िल्मी गीतकारों में अपनी एक ख़ास जगह बना ली, तब अंजान ने अपने लिए अपनी मर्ज़ी का लिखने की अपनी इच्छा को पूरा किया और फिर उनकी किताब आई “गंगा तट का बंजारा”। इस किताब के लोकार्पण के कुछ महीनों बाद 13 सितम्बर 1997 में वो हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह गए और पीछे छोड़ गए अपने लिखे हुए शानदार गीत।

अंजान के लिखे कुछ मशहूर गीत

  1. आपके हसीन रुख़ पे – बहारें फिर भी आएँगी
  2. खइके पान बनारस वाला – डॉन
  3. दिल तो है दिल – मुकद्दर का सिकंदर
  4. रोते हुए आते हैं सब – मुकद्दर का सिकंदर
  5. ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना – मुकद्दर का सिकंदर
  6. प्यार जिंदगी है – मुकद्दर का सिकंदर
  7. छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा – याराना
  8. काहे पैसे पे इतना गुरुर करे है – लावारिस
  9. मुझे नौलखा मंगा दे रे – शराबी
  10. खून पसीने की जो मिलेगी तो खाएंगे – ख़ून पसीना
  11. यशोदा का नंदलाला – संजोग
  12. गोरी हैं कलाईयां तू ला दे मुझे हरी हरी चूड़ियां – आज का अर्जुन

By Neetu

Neetu Sharma is working in different fields of media for more than 21 years. Painter turned TV Host, Radio Jockey, Content Writer, and now YouTuber, and blogger.

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